हडप्प्पा संस्कृति की व्यापकता एवं विकास को
देखने से ऐसा लगता है कि यह सभ्यता किसी
केन्द्रीय शक्ति से संचालित होती थी। वैसे यह
प्रश्न अभी विवाद का विषय बना हुआ है, फिर भी
चूंकि हडप्पावासी वाणिज्य की ओर अधिक
आकर्षित थे, इसलिए ऐसा माना जाता है कि
सम्भवतः हड़प्पा सभ्यता का शासन वणिक वर्ग
के हाथ में था।
ह्नीलर ने सिंधु प्रदेश के लोगों के शासन को 'मध्यम वर्गीय जनतंन्त्रात्मक शासन' कहा और
उसमें धर्म की महत्ता को स्वीकार किया।
स्टुअर्ट पिग्गॉट महोदय ने कहा 'मोहनजोदाड़ों का
शासन राजतन्त्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक'
था।
मैके के अनुसार ‘मोहनजोदड़ो का शासन एक
प्रतिनिधि शासक के हाथों था।
सैंधव-सभ्यता का विनाश
सैधव-सभ्यता के पतन के संदर्भ में ह्नीलर का
मत पूरी तरह से अमान्य हो चुका है। हरियूपिया का
उल्लेख जो ऋग्वेद में प्राप्त है उस ह्नीलर ने
हड़प्पा मान लिया और किले को पुर और आर्या के
देवता इंद्र को पुरंदर (किले को नष्ट करने वाला)
मानकर यह सिद्धांत प्रतिपादित कर दिया कि
सैंधव नगरों का पतन आर्यो के आक्रमण के
कारण हुआ था। ज्ञातव्य है कि ह्नीलर का यह
सिद्धान्त तभी खंडित हो जाता है जब सिंधु-
सभ्यता को नागरीय सभ्यता घोषित किया जाता
है। मोहनजोदाड़ो से प्राप्त नर कंकाल किसी एक
की समय के नहीं है जिनमें व्यापक नरसंहर
द्योतित हो रहा है।
सैधव-सभ्यता के पतन के विषय में इतिहासकारों
के मत
1- प्रशासनिक शिथिलता के कारण इस सभ्यता
का विनाश हुआ- जॉन मार्शल
2- जलवायु में हुए परिवर्तन के कारण यह सभ्यता
नष्ट हुई- ऑरेल स्टाइन
3- सिंधु सभ्यता बाढ़ के कारण नष्ट हुई-
अर्नेस्ट मैके एवं जॉन मार्शल
4- भू तात्विक परिवर्तन के कारण सभ्यता नष्ट
हुई- एम.आर.साहनी, आर.एल.राइक्स, जॉर्ज
एफ.डेल्स, एच.टी.लैम्ब्रिक
5- मोहनजोदाड़ो के लोगों की आग लगाकर हत्या
कर दी गयी- डी.डी. कोसाम्बी
6- सैंधव सभ्यता विदेशी आक्रमण व आर्यों के
आक्रमण से नष्ट हुई- गार्डन चाइल्ड,
मार्टीमर ह्वीलर, डी.एच.गार्डन, स्टुअर्ड
पिग्ग्ट
आर्थिक स्थिति
कृषि
सिंधु तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रति
वर्ष लायी गयी उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी कुषि हेतु
महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी। इन उपजाऊ मैदानों
में मुख्य रूप से गेहूँ और जौ की खेती की जाती थीं,
सिंधु घाटी की यही फ़सल भी थी। अभी तक 9
फ़सलें पहचानी गयी हैं। चावल केवल गुजरात,
लोथल में और संभवतः राजस्थान में भी, जौ की दो
किस्में , गेहूँ की तीन किस्में, कपास खजूर, तरबूज
मटर और एक ऐसी किस्म जिसे ‘ब्रासिक जुंसी‘
की संज्ञा दी गयी है। इसके अतिरिक्त मटर,
सरसों, तिल एवं कपास की भी खेती होती थी।
लोथल में हुई खुदाई में धान तथा बाजरे की खेती के
अवशेष मिले है।
इस समय खेती के कार्यो में प्रस्तर एवं कांस्य
धातु के बने औजार प्रयुक्त होते थे। कालीबंगा में
प्राक्-सैंधव अवस्था के एक हल से जुते हुए खेत
का साक्ष्य मिला है। बणावली में मिट्टी का बना
हुआ एक खिलौना मिला है। ऐसा प्रतीत होता है
कि हड़प्पा के लोग लकड़ी के हल का प्रयोग करते
थे। सम्भवतः हड़प्पा सभ्यता के लोग ही
सर्वप्रथम कपास उगाना प्रारम्भ किये। इसीलिए
यूनानी लोगों ने इस प्रदेश को ‘सिडोन‘ कहा।
लोथल से आटा पीसने की पत्थर की चक्की के दो
पाट मिले हैं। पेड़-पौधों में पीपल, खजूर, नीम, नीबू
एवं केला साक्ष्य मिले हैं।
पशुपालन
मुख्य पालतू पशुओं में डीलदार एवं बिना डील
वाले बैल, भैंस, गाय, भेड़-बकरी, कुत्ते, गधे,
खच्चर और सुअर आदि है। हाथी और घोड़े पालने
के साक्ष्य प्रमाणित नहीं हो सके हैं। लोथल एवं
रंगपुर से घोड़ी की मृण्मूर्तियों के अवशेष मिले हैं।
सूरकोटदा से सैन्धव कालीन घोड़े की अस्थिपंजर
के अवशेष मिले हैं। कुछ पशु-पक्षियों, जैसे बन्दर,
खरगोश, हिरन, मुर्गा, मोर, तोता, उल्लू के अवशेष
खिलौनों और मूर्तियों के रूप में मिले हैं।
शिल्प एवं उद्योग धन्धे
इस समय तांबे में टिन मिलाकर कांसा तैयार किया
जाता था। तांबा राजस्थान के खेतड़ी से, टिन
अफ़गानिस्तान से मंगाया जाता था। सम्भवतः
कसेरों (कांस्य शिल्पियों) का समाज में
महत्त्वपूर्ण स्थान था। कसेरों के अतिरिक्त
राजगीरों एवं आभूषण निर्माताओं का समुदाय भी
सक्रिय था। सैंधव सभ्यता में सूती वस्त्र का
उल्लेख मिलता है।
मोहनजोदाड़ो से मजीठा से लाल रंग रंगे हुये कपड़े
के अवशेष चांदी के बर्तन में पाये गये थे। तांबे के
दो उपकरणों में लिपटा हुआ सूती कपड़ा एवं सूती
धागे भी मोहनजोदाड़ो से प्राप्त हुये थे।
मोहनजोदाड़ो से बने हुए सूती कपड़े की छाप मिली
है।
कालीबंगा से मिले मिट्टी के बर्तन के एक टुकड़े
पर सूती कपड़े की छाप मिली है। कालीबंगा से
मिले मिट्टी के बर्तन लिपटा हुए एक उस्तरा भी
मिला है।
लोथल से प्राप्त मुद्रांक पर सूती वस्त्रों छाप
मिली है।
आलमगीरपुर से प्राप्त मिट्टी की एक नांद पर बुने
हुए वस्त्र के निशान मिले हैं।
मोहनजोदड़ों से प्राप्त पुरोहित की प्रस्तर
मूर्तियों तिपातिया अलंकरण युक्त शाल ओढ़े हुए
हैं।
इन साक्ष्यों के आधार पर ऐसा लगता है कि इस
समय सूती वस्त्र एवं बुनाई उद्योग काफ़ी
विकसित था। कताई में प्रयोग होने वाली तकलियों
के भी प्रमाण मिले हैं। इस समय के महत्त्वपूर्ण
शिल्पों में मुद्रा निर्माण एवं मूर्ति का निर्माण
सम्मिलित है। इस सभ्यता के लोगों द्वारा नाव
बनाने के भी साक्ष्य मिले हैं। इस समय बनने वाले
सोने, चांदी के आभूषणों के लिए सोना, चांदी
सम्भवतः अफ़गानिस्तान से एवं रत्न दक्षिण
भारत से मंगाया जाता था। इस समय कुम्हार के
चाक से निर्मित मृदभांड काफ़ी प्रचलित थे, जिन
पर गाढ़ी लाल चिकनी मिट्टी पर काले रंग
ज्यामितीय एवं सीसा का उन्हें ज्ञान था। इन
धातुओं से विभिन्न प्रकार के आभूषण एवं
उपंकरण बनाए जाते थे। खुदाई में तांबे-कांसे के
उपकरण अधिक मात्रा में मिले हैं। चन्हूदड़ों तथा
लोथल में मनके बनाने का कार्य होता था।
चन्हुदड़ों में सेलखड़ी मुहरें तथा चर्ट क बटखरे भी
तैयार किय जाते थे। बालाकोट तथा लोथल में सीप
उद्योग अपने विकसित अवस्था में था।
व्यापार एवं वाणिज्य
हड़प्पाई लोग सिंधु सभ्यता के क्षेत्र के भीतर
पत्थर, धातु शल्क आदि का व्यापार करते थे,
लेकिन वे जो वस्तुएं बनाते थे उसके लिए
अपेक्षित कच्चा माल उनके नगरों में उपलब्ध
नहीं था। अतः उन्हें बाह्य देशों से व्यापारिक
सम्पर्क स्थापित करना पड़ता था। तैयार माल की
खपत की आवश्यकता ने व्यापारिक संबंधो को
प्रगाढ़ बनाया। व्यापार में धातु के सिक्कों का
प्रयोग नहीं करते थे वरन वस्तु विनिमय प्रणाली
पर ही उनके व्यापार आधारित थे। व्यापारिक
वस्तुओ की गांठों पर शिल्पियों एवं व्यापारियों
द्वारा अपनी मुहर की छाप थी तथा दूसरी ओर भेजे
जाने वाले का निशान अंकित था। बाट-माप एवं
नाप तोल का व्यापारिक कार्य में महत्त्वपूर्ण
योगदान है। मोहनजोदाड़ो, हड़प्पा, लोथल एवं
कालीबंगा में प्रयुक्त बाटों की तौल का अनुपात 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 200, 320 आदि था। बाट धनाकार, वर्तुलाकार, बेलनाकार,
शंक्वाकार एवं ढोलाकार थे। तौल की इकाई
संभवतः 16 अनुपात में थी। मोहनजोदाड़ों से सीप का तथा लोथल से हांथी दांत का निर्मित एक-एक पैमाना मिला है।
यातायात
सैधव सभ्यता के लोग यातायात के रूप में दो
पहियों एवं चार पहियों वाली बैलगाड़ी अथवा
भैसागाड़ी का उपयोग करते थे। उनकी बैलगाड़ी में
प्रयुक्त पहिये ठोस आकार के होते थे।
मोहनजोदाड़ो से प्राप्त एक मुहर पर अंकित नाव
का चित्रएवं लोथल से मिट्टी की खिलौना नाव से
यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस सभ्यता
के लोक आन्तरिक एवं बाह्य व्यापार में मस्तूल
वाली नावों का उपयोग करते थे। हड़प्पा सभ्यता
के लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध राजस्थान,
अफ़गानिस्तान, ईरान एवं मध्य एशिया के साथ
था। हड़प्पावासी लाजवर्द मणि का आयात
अफ़गानिस्तान से करते थे। उद्योग धन्धों एवं
शिल्प कार्यो के लिए कच्चा माल गुजरात, सिन्धु,
राजस्थान, दक्षिणी भारत, बलूचिस्तान आदि
क्षेत्रों से मंगाया जाता था। इसके अतिरिक्त
अफ़गानिस्तान, सोवियत तुर्कमानिया तथा
मेसोपाटामिया आदि से भी कच्चा माल मंगाया
जाता था। मनके बनाने के लिए 'गोमेद' गुजरात से
मंगाया जाता था। फ्लिण्ट तथा चर्ट के प्रस्तर-
खण्ड पाकिस्तान के सिन्ध क्षेत्र में स्थित रोड़ी
तथा सुक्कुर की खदानों से मंगाया जाता था। तांबा
राजस्थान के झुनझुन ज़िले में स्थित खेतड़ी (खेत्री) की खानों से मंगाया जाता था। सोना
कर्नाटक के कोलार की खानों से मिलता था।
आयात निर्यात
आयात किया गया कच्चा माल
1- टिन - अफ़गानिस्तान, ईरान
2- ताँबा - खेतड़ी, राजस्थान, बलूचिस्तान
3- चांदी - ईरान, अफ़गानिस्तान
4- सोना - अफ़गानिस्तान, फ़ारस, दक्षिणी भारत
5- लाजवर्द - मेसापोटामिया
6- सेलखड़ी - बलूचिस्तान, राजस्थान, गुजरात
7- नीलरत्न - बदख्क्षां
8- नीलमणि - महाराष्ट्र
9- हरितमणि - दक्षिण एशिया
10- शंख एवं कौड़ियां - सौराष्ट्र, दक्षिणी भारत
11- सीसा - ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, राजस्थान
12- शिलाजीत - हिमालय क्षेत्र
लाजर्वद एव चांदी अफ़गानिस्तान से आयात की
जाती थी। अफ़गानिस्तान का वदक्क्षां क्षेत्र
लाजर्वद के लिए प्रसिद्व था।
अफ़गानिस्तान में स्थित शोर्तगुई नामक स्थान तक सिन्धु सभ्यता का प्रसार मिलता है। इसके अतिरिक्त अन्यथा नहीं मिला है, इसलिए शोर्तगुई दो मध्यवर्ती व्यापारिक बस्ती माना जा सकता है। ईरान से संगयशव अथवा हरिताशम, फ़ीरोज़ा, टिन तथा चांदी आयात की जाती थी। सिन्धु से मेसोपोटामिया को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में सूती वस्त्र, इमारती लकड़ी, मशाले, हाथीदांत एवं पशु-पक्षी रहे होगें। उर, किश, लगश, निष्पुर, टेल अस्मर, टेपे, गावरा, हमा आदि मेसोपोटामिया के नगरों से सिन्धु सभ्यता की लगभग एक दर्जन मुहरें मिली हैं। मेसेपोटामिया से सिन्धु सभ्यता के
नगरों द्वारा आयात की जाने वाली वस्तुओं में
मोहनजोदाड़ो से प्राप्त हरिताभ रंग का क्लोराइट
प्रस्तर का टुकड़ा जिस पर चटाई की तरह
डिजाइन बनी है, उल्लेखनीय है। मेसोपाटामिया
और सिन्धु सभ्यता के बीच व्यापारिक सम्बन्धों
के विषय में अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर यह
ज्ञात होता है कि दिलमुन से सोना, चाँदी,
लाजवर्द, माणिक्य के मनके, हाथीदांत, की कंघी,
पशु-पक्षी, आभूषण आदि आयात किया जाता
था। मेसोपाटामिया में प्राप्त सिंधु सभ्यता से
सम्बन्धित अभिलेखों एवं मुहरों पर ‘मेलुहा‘ का
ज़िक्र मिलता है। मेलुहा सिंध क्षेत्र का ही
प्राचीन भाग है। दिलमुन एवं मकन व्यापारिक
केन्द्र मेलुहा सिंध क्षेत्र का ही प्राचीन भाग है।
मेसोपोटामिया में प्रवेश हेतु ‘उर‘ उक महत्त्वपूर्ण
बन्दरगाह था। दिलमुन की पहचान फारस की
खाड़ी के बहरीन द्वीप से की जाती है। दिलमुन
सैंधव व्यापारिक केन्द्रों तथा मेसोपोटामिया के
साथ व्यापार का मध्यस्थ बंदरगाह था। भारत में
लोथल से फारस की मुहरें प्राप्त हुई हैं। उन्होंने
उत्तरी अफ़गानिस्तान में एक वाणिज्य उपनिवेश
स्थापित किया था जिसके सहारे उनका व्यापार
मध्य एशिया के साथ चलता था।